प्रयागराज का इतिहास

"प्रमाणिक इतिहास के आरंभ के काफी पूर्व से प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) में जैसा कि यह आज है, का भू-भाग सभ्य प्रजातियों के प्रभाव में रहा है जब कि प्रागैतिहासिक काल में इसके सत्र सामायिक स्थान आज समाप्त हो गये हैं, प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्र का प्रयाग आज भी महाभारत काल के इन्द्रप्रस्थ की तरह विद्यमान है जहां यह 5000 वर्षों पूर्व था "। (माडर्न ई०पू० 1910)

600 ईशा पूर्व में वर्तमान प्रयागराज जिला के भागों को आवृत्त करता हुआ एक राज्य था। इसे "कौशाम्बी" में राजधानी के साथ "वत्स" कहा जाता था। जिसके अवशेष आज भी प्रयागराज के पश्चिम में स्थित है। गौतम बुद्ध ने अपनी तीन यात्रायें करके इस शहर को गौरव प्रदान किया। इस क्षेत्र के मौर्य साम्राज्य के अधीन आने के पश्चात् कौशाम्बी को अशोक के प्रांतों में से एक का मुख्यालय बनाया गया था। उसके अनुदेशों के अधीन दो अखण्ड स्तम्भों का निर्माण कौशाम्बी में किया गया था। जिनमें से एक बाद में प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) स्थानांतरित कर दिया गया था।

मौर्य साम्राज्य की पुरातन वस्तुएं एवं अवशेषों की खुदायी, जिले के एक अन्य महत्वपूर्ण स्थान भीटा से की गयी है। मौर्य के पश्चात् शुंगों ने वत्स या प्रयागराज क्षेत्र पर राज्य किया। यह प्रयागराज जिले में पायी गयी शुंगकालीन कलात्मक वस्तुओं से आभासित होता है। शुंगो के पश्चात् कुषाण सत्ता में आये- कनिष्क की एक मुहर और एक अद्वितीय मूर्ति लेखन कौशाम्बी में पायी गयी है जो उसके राज्य के द्वितीय वर्ष के दौरान की है। कौशाम्बी, भीटा एवं झूंसी में गुप्त काल की वस्तुयें भी पायी गयी हैं। अशोक स्तम्भ के निकाय पर समुद्रगुप्त की प्रशस्ति की पंक्तियां खुदी हुई हैं जब कि झूंसी में वहां उसके पश्चात् नामित समुद्र कूप विद्यमान है। गुप्तों के पराभव पर प्रयागराज का भविष्य विस्मृत हो गया। हृवेनसांग ने 7वी शताब्दी में प्रयागराज की यात्रा किया और प्रयाग को मूर्तिपूजकों का एक महान शहर के रूप में वर्णित किया जिसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणवाद की महत्ता उनकी यात्रा के समय तक स्थापित रही है।

1540 में शेरशाह हिन्दुस्तान का शासक हो गया, यह इसी समय था कि पुरानी ग्रांड ट्रंक रोड आगरा से कारा तक बनायी गयी थी और तब पूर्व में प्रयागराज, झूंसी और जौनपुर तक बनायी गयी थी। 1557 में झूंसी एवं प्रयाग के अधीन ग्राम मरकनवल में जौनपुर के विद्रोही गवर्नर और अकबर के मध्य एक युद्ध लड़ा गया था। विजय के उपरांत अकबर एक दिन में ही प्रयाग आया और वाराणसी जाने के पूर्व दो दिनों तक यहां विश्राम किया, यह तभी था कि उसने इस रणनीतिक स्थान पर एक किला के महत्व का अनुभव किया।

अकबर वर्ष 1575 में पुनः प्रयाग आया और एक शाही शहर की आधारशिला रखा। जिसे उसने इलाहाबास कहा। अकबर के शासन के अधीन नवीन शहर तीर्थयात्रा का अपेक्षित स्थान हो गया। शहर के महत्व में तीव्र विकास हुआ और अकबर का शासन की समाप्ति के पूर्व इसके आकार और महत्व में पर्याप्त वृद्धि हुई।

प्रयागराज के प्रसिद्ध व्यक्तित्व